a) अपने अभिलेखों को पूरी तरह से श्रेणीबध्द एवं सूचीबध्द ढंग से रखें ताकि इस अधिनियम के अंतर्गत जानकारी प्राप्त करने के लिये लोगों को आसानी हो सके। संसाधनों की उपलब्धता को देखते हुये एक समय सीमा के भीतर अभिलेखों को कम्प्युटरीकृत किये जाने की तैयारी करें। यह सुनिश्चित करें कि सभी अभिलेख कम्प्युटरीकृत होकर देश भर की विभिन्न प्रणालियों के नेटवर्क में जुड़ सकें, जिससे कि इन अभिलेखों को कोई भी आसानी से प्राप्त कर सके।
b) इस अधिनियम के लागू होने के 120 दिन के भीतर संस्थान अपने बारे में निम्नलिखित जानकारियाँ प्रकाशित करें -
(i) संस्था का संपूर्ण ब्यौरा, कार्य एवं दायित्व।
(ii) अपने अधिकारियों एवं कर्मचारियों के अधिकार एवं कर्तव्य।
(iii) संस्था के भीतर निर्णय लेने में क्या प्रक्रिया अपनायी जाती है। इसमें यह भी शामिल हो कि पर्यवेक्षण का क्या तरीका होगा तथा कौन किसके प्रति जवाबदेह होगा।
(iv) संस्था द्वारा अपने कार्यों का निर्वहण करने के लिये किस तरह के मापदंड तय किये गये हैं।
(v) संस्था के नियंत्रण में कौन-कौन से कानून, नियम-कायदे, निर्देश, अनुदेश एवं अभिलेख आते हैं जिनका उपयोग संस्था के कर्मचारियों द्वारा अपने कार्यों के निर्वहण के लिये किया जाता है।
(vi) संस्था द्वारा रखे जाने वाले दस्तावेज किस-किस तरह (श्रेणियों) के है, उसका स्पष्ट विवरण।
(vii) यदि जनता के परामर्श से या उनके प्रतिनिधित्व में किसी तरह की नीति बनाने अथवा उसके क्रियान्वयन की कोई व्यवस्था संस्था में है तो उसका विवरण।
(viii) संस्था के मंडल, परिषद्, समिति या अन्य ऐसी इकाइयाँ, जो दो या दो से अधिक व्यक्तियों से मिलकर गठित की गई हो, चाहे वह संस्था का ही हिस्सा हो या फिर उसे सलाह देने के लिये बनायी गई हो। उनकी जानकारी स्पष्ट की जाये तथा क्या इन सबकी बैठकों में नागरिक शामिल हो सकते हैं या बैठक की कार्यवाही लोगों को मिल सकती हैं?
(ix) संस्थान के अधिकारियों एवं कर्मचारियों के बारे में संपूर्ण जानकारियाँ। इसके अंतर्गत नाम, पदनाम, पदस्थापना, कार्यालय, पता, फोन नंबर, योग्यता एवं कार्यदायित्व शामिल होंगे।
(x) संस्थान के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को दिया जाने वाला मासिक वेतनमान। इसके अंतर्गत नियमानुसार दिये जाने वाले पारितोषिक (कम्पनसेशन) का जिक्र भी होगा।
(xi) संस्थान की विभिन्न एजेंसियों को आवंटित किये जाने वाला बजट। इसमें सभी योजनाओं की स्पष्ट जानकारी, प्रस्तावित खर्चें एवं भुगतान की रिपोर्ट भी होनी चाहिए।
(xii) संस्था द्वारा आर्थिक सहायता (अनुदान) दिये जाने के क्या तरीके हैं। इसमें यह भी शामिल होना चाहिए कि आर्थिक सहायता कार्यक्रम में हितग्राही कौन हो सकते हैं एवं इसके लिये कितनी राशि आवंटित की गयी है।
(xiii) अधिकृत किये जाने वाले हितग्राहियों का विवरण।
(xiv) संस्था में उपलब्ध या संधारित की जाने वाली सभी जानकारियों का विवरण। यह जानकारियाँ इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में छोटे आकार में रखी जायेंगी। उदाहरण के लिये-फ्लॉपी, सीडी में तालिकाओं एवं सारणी के रूप में।
(xv) नागरिकों के लिये जानकारियाँ प्राप्त करने की कौन सी सुविधाएँ उपलब्ध हैं,
उनका विवरण। यदि जनता के उपयोग के लिये कोई पुस्तकालय या अध्ययन कक्ष चलाया जा रहा है तो उसका समय एवं कार्य के घंटे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिये।
(xvi) लोक सूचना अधिकारियों के नाम, पद एवं अन्य विवरण
(xvii) इस तरह की अन्य जानकारियाँ जो जनता के लिये जरूरी हों या अनुशंशित की जायें उन्हें शामिल करते हुये इस प्रकाशन को हर साल नवीनीकृत और अद्यतन (अपडेट) किया जाये।
c) जनता को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण नीतियों को बनाते समय अथवा निर्णयों की घोषणा करते समय उससे जुड़े सभी तथ्यों को प्रकाशित करें।
d) प्रभावित व्यक्ति को इन नीतियों और निर्णयों के प्रशासनिक कारण बतायें। उसका न्यायिक आधार और अर्थ भी प्रस्तुत करें।
(2) सार्वजनिक संस्थाओं/प्राधिकरणों का यह सतत प्रयास रहना चाहिए कि उप धारा-1 की धारा इ, की जरूरत के अनुसार लोगों को अधिक से अधिक जानकारी स्वयं ही उपलब्ध कराते रहें। यह जानकारी नियमित रूप से, समय-समय पर, संचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा जनता को दी जाये। इसमें इंटरनेट भी शामिल हो ताकि लोगों को जानकारी लेने के लिये भटकना न पड़े।
(3) उप धारा-1 में दर्शाये गये उद्देश्यों को पूरा करने के लिये हर जानकारी विस्तार पूर्वक एवं इस तरह से प्रदर्शित की जानी चाहिए ताकि लोग उसे आसानी से हासिल कर सकें।
(4) जानकारियों को प्रदर्शित करते समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि इनमें कम से कम लागत लगे, स्थानीय भाषा प्रयोग हो और उस क्षेत्र में सूचना देने का जो भी प्रभावी तरीका हो उसका इस्तेमाल हो, साथ ही साथ वह लोगों की पहुँच के भीतर हो। जहाँ तक संभव हो केन्द्रीय लोक सूचना अधिकारी अथवा राज्य लोक सूचना अधिकारी के पास यह इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में उपलब्ध हो। जानकारी मुफ्त में उपलब्ध हो या फिर जिस माध्यम में हो उसकी लागत अथवा छपाई की लागत लेकर दी जा सकती है।
स्पष्टीकरण: उप धारा 3 एवं 4 में उल्लेख किये गये शब्द 'जानकारी प्रदर्शित करने' का अर्थ है जानकारी में लाना या सूचना पटल, समाचार पत्र, सार्वजनिक घोषणा, टीवी-रेडियो प्रसारण, इंटरनेट या अन्य माध्यमों द्वारा सूचना प्रसारित करना। इसमें किसी भी सार्वजनिक संस्था/प्राधिकरण के कार्यालयों का निरीक्षण भी शामिल है।
टिप्पणी: उपरोक्त जानकारी मध्यप्रदेश शासन द्वारा तय किये गये नियम एवं प्रक्रिया के अनुसार उपलब्ध है।
इस परियोजना का क्रियान्वयन मध्यप्रदेश सोसायटी फॉर रुरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन द्वारा किया जा रहा है। यह सोसायटी मध्यप्रदेश सोसायटी अधिनियम के अंतर्गत पंजीकृत की गई है। पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री इस सोसायटी के अध्यक्ष हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के प्रमुख सचिव के अधीन बनायी गई सोसायटी की कार्यकारी समिति इस परियोजना की निगरानी करती है। मध्यप्रदेश शासन के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक सशक्त समिति है जो इस परियोजना को अन्तर विभागीय समन्वयन एवं नीतिगत मामलों संबंधी मदद करती है। परियोजना समन्वयक, राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई के मुखिया हैं। परियोजना के प्रभावी क्रियान्वयन एवं निगरानी की प्राथमिक जिम्मेदारी, राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई की है। राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई, राज्य स्तर पर वरिष्ठतम अधिकारियों एवं समकक्ष अधिकारियों के मध्य अन्तर संबंध बनाती है। राज्य के स्तर पर यह इकाई परियोजना का समन्वयन करती है।
आजीविका फोरम को नीतिगत दिशा-निर्देश देने के लिये एक संचालन समूह है। परियोजना समन्वयक इस समूह के सचिव के रूप में कार्य करते हैं। विभिन्न विभागों एवं संस्थाओं के मध्य समन्वय बनाने के लिए जिला स्तर पर जिला परियोजना प्रबंधन समिति है, जिसके अध्यक्ष कलेक्टर हैं। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला परियोजना समन्वयक हैं, जिला परियोजना सहायता इकाई उन्हें परियोजना के क्रियान्वयन में मदद करती है। ग्राम समूह स्तर पर विविध विशेषज्ञता के परियोजना सहायक दल बनाये गये है। यह परियोजना सहायक दल आजीविका उपक्रम की योजना बनाने, तकनीकी जानकारी देने, क्षमतावृध्दि की जरूरतों को पहचानने एवं आजीविका उपक्रम के क्रियान्वयन के कामों में ग्रामसभा, ग्राम समितियों, सामुदायिक समूहों और आजीविका मित्रों की मदद करते हैं। गाँव के स्तर पर ग्राम विकास समिति और ग्राम सभा की अन्य समितियाँ मिलकर परियोजना के क्रियान्वयन में मदद करती हैं।
ब्रिटिश सरकार के अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग (डीएफआईडी) द्वारा मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना के प्रथम चरण के लिए 16.49 मिलियन पाउन्ड (114.87 करोड़) रूपये की राशि तीन वर्षों (2004-07) में उपलब्ध कराई गई। द्वितीय चरण में इन्हीं आठ जिलों के नये गांवों को शामिल किया गया है। इस प्रकार पहले चरण के 822 गांवों को शामिल करते हुए करीब चार हजार गांवों में एक जुलाई 2007 से दूसरे चरण का विस्तार हुआ है। डीएफआईडी द्वारा पांच वर्षो में 45 मिलियन पाउन्ड (357 करोड़ रूपये) की राशि उपलब्ध करायी जाएगी।
कार्यप्रणाली और दायित्व:
मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना के अंतर्गत राज्य के चयनित आदिवासी बहुल जिलों में गरीब लोगों की आजीविका को बढ़ाने के लिये दोहरी एवं अंतर संबंधित कार्यनीति को है। एक ओर आधारभूत संसाधनों को मजबूत किया जाता है जिससे आजीविका के संसाधन बढ़ें और दूसरी तरफ आय बढ़ाने की गतिविधियों को पोषित किया जाता है जिससे रोजगार उपलब्ध हों और गाँव के गरीब लोगों के लिए आमदनी के अवसर पैदा हों। जलग्रहण प्रबंधन एवं संयुक्त वन प्रबंधन को एकीकृत करते हुए गरीबों के जल, जंगल और जमीन जैसे संसाधनों को बेहतर बनाने की पहल हुई है। कृषि उपज और वनोपजों के विपणन के साथ-साथ अन्य लघु व्यापारों में सुधार लाने की दिशा में भी कदम उठाये जा रहे हैं। आजीविका की बहुआयामी रणनीति में पलायन करने वाले मजदूरों की सहायता और जानकारी तक आसान पहुँच को भी शामिल किया गया है।
मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना का प्रथम चरण सात आदिवासी बहुल जिलों के चयनित 760 गाँवों में चलाया जा रहा है। ये जिले हैं बढ़वानी, धार, झाबुआ, मण्डला, डिण्डौरी, अनूपपुर और शहडोल। हाल में प्रथम चरण में श्योपुर जिले को भी शामिल किया गया है यहाँ विशिष्ट पिछड़ी जनजाति, 'सहरिया' बड़ी तादाद में है। दूसरे चरण के लिये रतलाम, खरगौन, खण्डवा, बुरहानपुर, बैतूल, सिवनी, छिन्दवाडा, जबलपुर, कटनी, बालाघाट और उमरिया जिले तथा होशंगाबाद, हरदा एवं देवास जिलों के कुछ हिस्से इस परियोजना में शामिल किए जाना प्रस्तावित है।
परियोजना स्थानीय संस्थाओं एवं समुदाय की क्षमता वृध्दि करने तथा गाँव के स्तर पर संसाधनों, योजनाओं एवं प्रयासों का इस्तेमाल करने पर विशेष ध्यान केंद्रित कर रही है। परियोजना की सभी गतिविधियों में पंचायतराज संस्थाओं, नागरिक संगठनों एवं सरकारी संस्थाओं तथा ग्रामीण समूहों को शामिल किया जाता है। लोगों की आजीविका को सुदृढ़ बनाने एवं उसे टिकाऊ बनाने के विभिन्न कार्यक्रमों की योजना स्थानीय स्तर पर बनाने पर खास ध्यान दिया जा रहा है। यह भी प्रयास है कि लोगों को प्रोत्साहित करने तथा परियोजना के क्रियान्वयन एवं देखरेख में भी स्थानीय लोग ही शामिल हों। इसमें नागरिक संगठनों और गैर सरकारी संस्थाओं की सक्रिय भागीदारी रहे।
कार्य प्रणाली में जिला एवं राज्य स्तर पर एक दूसरे से सीखने एवं अनुभवों की साझेदारी को एक प्रमुख बिंदु के रूप में शामिल किया गया है। आजीविका के संदर्भ में लोगों की जरूरतों को देखते हुये परियोजना में गाँव, जिला तथा राज्य स्तर पर नवाचारों को बढ़ावा देने एवं संसाधनों का इस्तेमाल करने की व्यवस्था है।
परियोजना समन्वयक:
परियोजना के क्रियान्वयन की संपूर्ण जिम्मेदारी परियोजना समन्वयक की है। इसके अलावा परियोजना समन्वयक की यह भी जिम्मेदारी है कि वह मध्यप्रदेश शासन के दिशा-निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करें, मध्यप्रदेश सोसायटी फॉर रुरल लाइवलीहुड्स प्रमोशन की सामान्य सभा एवं कार्यकारी समिति की बैठक आयोजित करें तथा आजीविका फोरम के संचालन समूह के सचिव की जिम्मेदारी निभायें। सोसायटी के वित्तीय एवं प्रशासनिक नियमों के अनुसार परियोजना समन्वयक वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकारों का प्रयोग करते हैं।
राज्य समन्वयक वित्त एवं प्रशासन:
राज्य स्तर पर समन्वयक वित्त एवं प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह दैनिक वित्तीय एवं प्रशासनिक मामलों का प्रबंधन करें। खर्चों का आंतरिक एवं बाह्य अंकेक्षण (ऑडिट) करवाना, बजट का आकलन एवं बजट योजना तैयार करना, खर्चों पर नियंत्रण तथा सामान और सेवाओं की खरीदी करना, राज्य वित्त एवं प्रशासनिक समन्वयक के प्रमुख कार्य हैं। उनके करर््तव्यों में वित्त, लेखा और कर्मचारियों का प्रभार तथा कार्यालयीन प्रशासनिक कार्य शामिल हैं। इसके अलावा बैंकिंग, कोष प्रबंधन तथा दानदाताओं एवं अन्य जुड़े हुये लोगों को वित्तीय प्रतिवेदन देना, वित्त संबंधी नीतियाँ बनाना और उनका अनुपालन कराना तथा आंतरिक रूप से उन पर नियंत्रण रखना, लेखों का रख-रखाव, उसको एकजाही करना और अंकेक्षण करवाना य बजट संबंधी नियंत्रण, खरीदी, कर्मचारियों की नियुक्तियाँ तथा प्रशासनिक अधिकार प्रमुख हैं।
राज्य समन्वयक अनुश्रवण एवं मूल्यांकन:
राज्य स्तर पर इनकी प्रमुख जिम्मेदारी लक्ष्य, परिणाम एवं उपलब्धियों के आधार पर परियोजना की प्रगति का आकलन करना है। राज्य समन्वयक अनुश्रवण एवं मूल्यांकन की यह भी जिम्मेदारी है कि वह परियोजना गतिविधियों के मूल्यांकन एवं निगरानी के लिये सूचकांक, विधि एवं प्रारूप तैयार करें। इसके साथ ही जमीनी स्तर पर चल रहे काम के अनुभव और उनसे मिली सीख को भी संग्रहित करें। परियोजना प्रगति का दस्तावेजीकरण करना भी इनकी जिम्मेदारी में शामिल है।
इनकी जिम्मेदारियों में परियोजना की प्रमुख गतिविधियों की निगरानी करना तथा परिणामों के आधार पर कार्यक्रम की उपलब्धियों का मूल्यांकन करना, परियोजना के स्वरूप एवं क्रियान्वयन के तरीकों में बदलाव के सुझाव देना, कार्यक्रम को बेहतर बनाना, परियोजना के लिये कार्यक्रम बनाना एवं क्रियान्वयन करना और प्रतिवेदन तैयार करना, प्रबंधन एवं विभिन्न जुड़ाव रखने वाले लोगों को जरूरी जानकारियाँ उपलब्ध कराना, परियोजना के आंतरिक और बाहरी कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना ताकि उनमें परियोजना के अनुश्रवण करने एवं सही दिशा में कदम उठाने की क्षमता विकसित हो, परियोजना के प्रमुख कार्यक्रमों और उपलब्धियों के मापदंड संबंधी ऑंकड़ों और जानकारियों को व्यवस्थित रखना आदि शामिल है।
राज्य समन्वयक सूचना एवं संप्रेषण:
राज्य स्तर पर प्रमुख जिम्मेदारी है आंतरिक एवं बाहरी सूचना एवं संप्रेषण की योजना बनाना तथा उसे लागू करने की व्यवस्था करना। जानकारियों को प्रेस विज्ञप्ति, परियोजना वेबसाइट एवं न्यूजलेटर के माध्यम से जनता के सामने लाना भी इनका काम है। गाँव के स्तर पर लोगों को जागरूक बनाने के लिये सूचना एवं संप्रेषण की गतिविधियों की योजना बनाना एवं उनका क्रियान्वयन करना इनके प्रमुख कार्यों में से एक है। सूचना एवं संप्रेषण की रणनीतियाँ और योजनाएँ बनाना, इनका बजट तैयार करना, विकास संबंधी मुद्दों के प्रचार-प्रसार के लिये स्थानीय उपयुक्त संचार साधनों एवं वैकल्पिक साधनों की पहचान करना, परियोजना के अनुभवों एवं प्रक्रिया का दस्तावेजीकरण करना, पैरवी अभियानों का आयोजन, प्रोत्साहन सामग्री एवं न्यूजलेटर तैयार करना, मीडिया प्रबंधन, जनसंपर्क एवं आपसी समन्वय बनाना आदि ज़िम्मेदारियाँ शामिल हैं।
राज्य जेण्डर एवं समता समन्वयक:
इनकी जिम्मेदारी है आजीविका उपक्रमों में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करना तथा योजना एवं क्रियान्वयन ग़रीबों पर केंद्रित रखना जिससे परियोजना का लाभ सभी लोगों को बराबरी के आधार पर मिल सके। गैर-शासकीय संस्थाओं से जुड़े हुये मामलों को देखना भी इनका काम है।
इनकी जिम्मेदारियों में जेण्डर एवं समता के प्रति संवेदनशील बनाने वाली कार्यनीतियों को बनाना और उनका क्रियान्वयन करना, आजीविका कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और इसके लिए समुदाय को प्रोत्साहित करना, संसाधनों के भेद-भाव रहित बंटवारे को बढ़ावा देना, गाँव स्तर पर सामुदायिक विकास की योजनाओं के साथ ही आजीविका उपक्रम को जोड़ना आदि शामिल है।
राज्य समन्वयक प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण:
इनकी जिम्मेदारी है कि लोगों में क्षमता संवर्धन की जरूरतों और प्रशिक्षणों की आवश्यकताओं आकलन करना, योजना बनाना, इन जरूरतों को पूरा करने के लिये संस्थाओं और विभागों को परियोजना के साथ जोड़ना तथा उपयुक्त प्रशिक्षण एवं क्षमता संवर्धन कार्यक्रम आयोजित करना। इनकी जिम्मेदारियों में परियोजना से जुड़े सभी भागीदारों के प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास की गतिविधियों का संचालन, लोगोें में कौशल-विकास और प्रशिक्षण की जरूरतों को निर्धारित करना, उपयुक्त प्रशिक्षण विधियों को अपनाना, प्रशिक्षण प्रारूप तैयार करना तथा प्रशिक्षण संस्थानों एवं संगठनों के साथ मिलकर प्रशिक्षणों का प्रबंध करना।
राज्य कार्यक्रम विशेषज्ञ पशुपालन:
पशुपालन कार्यक्रम विशेषज्ञ की जिम्मेदारी है कि वे परियोजना के गाँवों में पशुपालन आधारित आजीविका उपक्रमों को बढ़ावा देने वाले कार्यक्रमों की योजना बनायें और उनका क्रियान्वयन करें। पशुओं की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिये आधुनिक जानकारियाँ और तरीके बताना तथा इन विकल्पों के टिकाऊपन के लिये संस्थाओं को मजबूत बनाना, पशुपालन कार्यक्रम विशेषज्ञ की प्रमुख जिम्मेदारी है। इनकी जिम्मेदारियों में वनोपजों से जुड़े लघु व्यापारों की योजना बनाना और उन्हें विकसित करने का दायित्व भी है। डेयरी, मछली पालन, मुर्गी पालन एवं इनसे जुड़े उत्पाद और सेवाओं से संबंधित उद्यमों को बढ़ावा देना इनकी जिम्मेदारी है।
इनकी अन्य जिम्मेदारियों में पशुपालन/लघु व्यापार आधारित आजीविका उपक्रमों से संबंधित विशेषज्ञता की राय देना, लक्षित समुदायों को अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने के लिये कार्यक्रम के प्रारूप में बदलाव के सुझाव देना, मध्यप्रदेश में चली रही विकास योजनाओं के साथ परियोजना को जोड़ना, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण, विभिन्न संस्थाओं एवं विभागों के मध्य संपर्क रखना तथा संपूर्ण कार्यक्रम की सघन निगरानी करना शामिल है।
राज्य कार्यक्रम विशेषज्ञ जलग्रहण क्षेत्र एवं कृषि:
कृषि उत्पादन एवं उत्पादकता को बढ़ाने वाले कार्यक्रमों की योजना बनाना और उनका क्रियान्वयन करना, परियोजना के गाँवों में जलग्रहण क्षेत्र विकास तथा खेत में जल संवर्धन करके सिंचाई करने के तरीकों को प्रोत्साहित करना, जिससे मिट्टी और पानी का संरक्षण हो सके और शुष्क खेती को टिकाऊ बनाना, कृषि वानिकी, बागवानी, उद्यानिकी और चारागाह का विकास भी जलग्रहण एवं कृषि कार्यक्रम विशेषज्ञ का काम है।
इनकी जिम्मेदारी है कि खेती/जलग्रहण आधारित आजीविका उपक्रमों से संबंधित विशेषज्ञता की राय उपलब्ध करायें, लक्षित सामुदायों को अधिक से अधिक लाभ पहुँचाने के लिए कार्यक्रम प्रारूप में बदलाव का सुझाव दें, मध्यप्रदेश में चल रही विकास योजनाओं के साथ परियोजना गतिविधियों को जोड़ें, प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण, विभिन्न संस्थाआें और विभागों से संपर्क तथा कार्यक्रम की सघन निगरानी करें।
आजीविका फोरम समन्वयक:
इनकी जिम्मेदारी है कि आजीविका फोरम को विकसित करें, ताकि सभी स्तरों पर परियोजना क्रियान्वयन को सलाह एवं दिशा देने के लिये एक परामर्शदाता समूह उपलब्ध हो सके। इनकी जिम्मेदारियों में, प्रतिष्ठित आजीविका संस्थानों और/अथवा विशेषज्ञों से संपर्क स्थापित करना तथा उन्हें फोरम में शामिल करना, परियोजना क्रियान्वयन से उभर रहे मुद्दों पर शोध आयोजित कराना, निर्धारित समय पर होने वाली फोरम की बैठकें संचालित करना एवं सदस्यों द्वारा दिये गये महत्वपूर्ण सुझावों को परियोजना में शामिल करना, फोरम की बैठकों तथा शोध गतिविधियों से निकले हुए निष्कर्षों एवं सीखों का दस्तावेज बनाना और उसका प्रसार करना आदि शामिल हैं।
आजीविका फोरम वित्त एवं प्रशासन अधिकारी:
यह पदाधिकारी आजीविका फोरम के वित्तीय, लेखा संबंधी एवं प्रशासनिक कार्यों का प्रभारी है। इनकी जिम्मेदारियों में बैंक प्रबंधन, बजट बनाना, खर्चों पर नियंत्रण, लेखा कार्य, वित्तीय नियंत्रण एवं वित्तीय नीतियों का अनुपालन, समय-समय पर वित्त संबंधी रिपोर्ट, वेतन संबंधी प्रशासनिक कार्य शामिल हैं।
आजीविका फोरम संप्रेषण एवं दस्तावेजीकरण अधिकारी:
यह अधिकारी फोरम की संचार कार्यनीतियों को लागू करने में मदद करते हैं। परियोजना से मिल रहे अनुभवों और सीखों का दस्तावेज तैयार करना, प्रोत्साहन सामग्री तैयार करना, फोरम के प्रमुख को विविध कार्यों में सहयोग और सुझाव उपलब्ध कराना, मीडिया प्रबंधन एवं अन्य गतिविधियों में क्रियान्वयन करना इनके अन्य प्रमुख कार्य है।
जिला परियोजना अधिकारी:
जिला परियोजना अधिकारी जिले में परियोजना का क्रियान्वयन, समन्वयन तथा अन्य सरकारी विभागों व संस्थाओं के साथ संपर्क बनाना है। ये अधिकारी जिला परियोजना सहायता इकाई का प्रमुख हैं जो जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी के दिशा-निर्देशन में कार्य करती है। जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला परियोजना समन्वयक होते हैं।
जिले में परियोजना संबंधी विभिन्न गतिविधियों की योजना बनाना, क्रियान्वयन करना तथा उनकी निगरानी करना, राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई को रिपोर्ट करना इनके प्रमुख कार्य हैं। इनके दायित्वों में बहुआयामी आजीविका उपक्रम की योजना की गुणवत्ता सुनिश्चित करना, परियोजना भागीदारों का चयन, सरकारी विभागों एवं गैर शासकीय संस्थाओं के साथ संपर्क बनाना तथा सघन निगरानी करना शामिल है।
जिला वित्त एवं प्रशासन अधिकारी:
जिला वित्त एवं प्रशासन अधिकारी, वित्तीय एवं प्रशासनिक मामलों के लिये जिम्मेदार है। इसकी जिम्मेदारियों में बजट बनाना, वित्तीय आकलन, खर्चों पर नियंत्रण, निगरानी, आंतरिक अंकेक्षण एवं प्रशासनिक कार्य शामिल हैं। जिला स्तर पर वित्त लेखा एवं कर्मचारी तथा कार्यालयीन प्रशासनिक कार्यों का प्रभार जिला वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकारियों के पास है।
इसकी जिम्मेदारियों में बैंकिंग, कोष प्रबंधन, बजटिंग एवं खर्चों पर नियंत्रण, लेखा कार्य, वित्त नियंत्रण एवं नीतियों का अनुपालन, समय-समय पर वित्तीय रिपोर्ट, नियुक्ति एवं वेतन संबंधी प्रशासनिक कार्य, सामग्री खरीदी आदि शामिल हैं।
जिला अनुश्रवण एवं सीख अधिकारी:
जिला स्तर पर इनकी प्रमुख जिम्मेदारी लक्ष्य, परिणाम एवं उपलब्धियों के आधार पर परियोजना की प्रगति का आकलन करना तथा उसकी जानकारी तैयार कर राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई को सूचित करना है, ताकि परियोजना प्रगति का मूल्यांकन हो सके। इनकी यह भी जिम्मेदारी है कि वह परियोजना प्रगति को उपयुक्त प्रारूप में दस्तावेजीकरण करने में मदद करें तथा समीक्षा के लिये प्रतिवेदन तैयार करें। परियोजना की प्रमुख गतिविधियों तथा कार्यक्रम की उपलब्धियों की निगरानी करना भी इसकी जिम्मेदारी है। जिला स्तर पर एम.आई.एस. तथा रिपोर्ट तैयार करना और उसका विश्लेषण करना, रिपोर्ट और अभिलेखों के आधार पर आंतरिक एवं बाहरी कर्मचारियों के प्रशिक्षण कराना और परियोजना के प्रमुख कार्यक्रमों व उपलब्धियों के मापदण्ड संबंधी ऑंकड़ों और जानकारियों को व्यवस्थित रखना आदि इनके दायित्वों में शामिल है।
जिला जेण्डर एवं समता अधिकारी:
इनकी जिम्मेदारी है कि आजीविका उपक्रमों में महिलाओं की हिस्सेदारी सुनिश्चित करें तथा इस बात को ध्यान रखें कि इसकी योजना एवं क्रियान्वयन गरीबों पर केंद्रित हो तथा परियोजना का लाभ सभी लोगों को बराबरी के आधार पर मिल सके।
महिलाओं और गरीब लोगों के अधिकार संबंधी जानकारी देना और इसके संप्रेषण की गतिविधियाँ बनाना और आयोजित करना जिला जेण्डर एवं समता अधिकारी का काम है। इनकी जिम्मेदारियों में जेण्डर एवं समता के प्रति संवेदनशील बनाने वाली कार्यनीतियों को बनाना और उनका क्रियान्वयन करना, आजीविका कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और इसके लिए समुदाय को प्रोत्साहित करना, संसाधनों के भेद-भाव रहित बँटवारे को बढ़ावा देना, गाँव स्तर पर सामुदायिक विकास की योजनाओं के साथ ही आजीविका उपक्रम को जोड़ना आदि शामिल है।
जिला सूचना एवं संप्रेषण अधिकारी:
परियोजना के गाँवों में जागरुकता बढ़ाने के लिए सूचना एवं संप्रेषण की गतिविधियों की योजनाएँ बनाना और उन्हें आयोजित करना, इनकी प्रमुख जिम्मेदारी है। परियोजना गतिविधियों के बारे में मीडिया एवं परियोजना से जुड़े अन्य लोगों को जानकारी देना, प्रेस विज्ञप्ति तैयार करना आदि जिला सूचना एवं संप्रेषण अधिकारी की जिम्मेदारी है। इनकी अन्य जिम्मेदारियों में जिला स्तर पर परियोजना की सूचना एवं संप्रेषण कार्यक्रमों को लागू करना, आजीविका के अनुभवों एवं उसकी प्रक्रिया के दस्तावेजीकरण में मदद करना, पैरवी अभियान आयोजित करना, प्रोत्साहन सामग्री एवं न्यूजलेटर तैयार करने में सहयोग करना, मीडिया प्रबंधन, जनसंपर्क एवं आपसी समन्वय बनाना आदि शामिल हैं।
जिला प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण अधिकारी:
इसकी जिम्मेदारी लोगों में क्षमता तथा कौशल निर्माण की जरूरतों और प्रशिक्षणों की आवश्यकताओं का आकलन करना और उनके संबंध में योजना बनाना। इन जरूरतों को पूरा करने के लिये जिला स्तर पर संस्थाओं और विभागों को परियोजना के साथ जोड़ना तथा इनकी मदद से उपयुक्त प्रशिक्षण एवं क्षमता वृध्दि कार्यक्रम आयोजित करना। अधिकारी जिला स्तर पर प्रशिक्षण एवं क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के लिये जिम्मेदार हैं।
परियोजना सहायता दल समन्वयक:
यह परियोजना सहायता दल के प्रमुख हैं और ग्राम समूह स्तर पर (संकुल) परियोजना गतिविधियों के क्रियान्वयन के लिये जिम्मेदार हैं। परियोजना सहायता दल समन्वयक विभिन्न कार्यों के संबंध में निर्णय लेने, योजना बनाने और उन्हें लागू करने तथा खर्चों में नियंत्रण रखने में ग्राम सभा और सामुदायिक संगठनों की मदद करते हैं।
जिला परियोजना सहायता इकाई एवं राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई को परियोजना प्रगति और अनुभवों की रिपोर्ट भेजना परियोजना सहायता दल समन्वयक की प्रमुख जिम्मेदारी है।
परियोजना सहायता दल के सदस्य:
गाँव के स्तर पर परियोजना क्रियान्वयन में मदद करना, परियोजना सहायक दल के सदस्यों का काम है। विभिन्न कार्यों के संबंध में निर्णय लेने, योजना बनाने और उन्हें लागू करने तथा खर्चों में नियंत्रण रखने में ग्राम सभा और सामुदायिक संगठनों की मदद करना भी इन सदस्यों का काम है। ये सदस्य ग्रामीणों के सतत संपर्क में रहते हैं और सरकार के अन्य विकास कार्यक्रमों को लागू करने में भी मदद करते हैं।
लेखापाल:
इनकी जिम्मेदारी वित्तीय लेखों एवं अभिलेखों का संधारण करना है। आवश्यकतानुसार लेखापाल, कोषप्रभारी की तरह कार्य करते हैं और एवं अंकेक्षण, खर्चा नियंत्रण तथा हिसाब-किताब तैयार करने आदि में राज्य समन्वयक वित्त एवं प्रशासन अथवा जिला वित्त एवं प्रशासन अधिकारी की मदद करते हैं।
इनकी जिम्मेदारियों में लेखा बहियों, रोकड़ बहियों, बैंक पुस्तिकाओं तथा बैंक के हिसाब-किताब मिलान संबंधी दस्तावेजों का रखरखाव करना, लेखा पुस्तकों के अंकेक्षण एवं समय-समय पर राशि की अद्यतन स्थिति के आकलन में मदद करना, बजट के आधार पर एम.आई.एस. तैयार करने, खर्चों का विश्लेषण एवं रिपोर्टिंग में सहयोग शामिल है।
निजी सहायक:
इसकी प्रमुख जिम्मेदारियों में विभिन्न फाइलों एवं कार्यालयीन अभिलेखों का रख-रखाव करना, पत्रों को भेजना एवं प्राप्त करना, उन्हें अभिलिखित करना है। कार्यक्रमों एवं कार्यशालाओं के आयोजन में मदद करना भी इसकी जिम्मेदारी है।
निजी सहायक पत्राचार एवं संचार, विभागीय बैठकों एवं यात्राओं के संयोजन, विभागीय सुविधाओं एवं उपकरणों के प्रबंधन, जानकारियों एवं ऑंकड़ों के रखरखाव में मदद करते हैं।
कार्यालय सहायक सह कंप्यूटर ऑपरेटर:
इसकी जिम्मेदारियों में सभी तरह के कार्यालयीन अभिलेख एवं फाइलों का रखरखाव, इंटरनेट से जानकारियाँ निकालना, फाइलों को तैयार करना एवं पत्राचार शामिल है। कंप्यूटर में ऑंकड़ों को व्यवस्थित करना तथा राज्य परियोजना प्रबंधन इकाई एवं अन्य अधिकारियों को विभिन्न कार्यों में मदद करना, कम्प्यूटरीकृत ऑंकड़े, प्रतिवेदन एवं रजिस्टरों का रखरखाव करना तथा समय-समय पर जानकारी आधारित प्रतिवेदनों को एकीकृत करना भी इनका दायित्व है।
ड्रायवर: वाहनों को चलाना एवं उनका रखरखाव ड्रायवर की जिम्मेदारी है।
भृत्य: कार्यालय में विभिन्न कार्यों में मदद करना इनका काम है।
अपने कार्यों का निर्वहण राज्य सरकार के सोसायटी कानून एवं परियोजना दिशा-निर्देश के आधार पर करते है।
(a) से लेकर (d) तक बताई गई समितियों की बैठकों में लोग शामिल नहीं हो सकते परंतु बैठक की कार्यवाही/अभिलेख प्राप्त कर सकते हैं।
इस बारे में विशिष्ट जानकारी मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है।
इस बारे में विशिष्ट जानकारी मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है।
इस बारे में विशिष्ट जानकारी मध्यप्रदेश ग्रामीण आजीविका परियोजना कार्यालय से प्राप्त की जा सकती है।
xiii) आर्थिक सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत छूट, अनुमति पाने वाले अथवा संस्था द्वारा अधिकृत किये जाने वाले हितग्राहियों का विवरण
(xiv) संस्था में उपलब्ध या संधारित की जाने वाली जानकारियों का विवरण। (यह जानकारियाँ इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में छोटे आकार में रखी जायेंगी। उदाहरण के लिये-फ्लॉपी, सीडी में तालिकाओं एवं सारणी के रूप में)
कार्यालयीन समय में आकर कोई भी नागरिक परियोजना के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये संपर्क कर सकता है। किसी तरह के पुस्तकालय या अध्ययन कक्ष की सुविधा उपलब्ध नहीं है।